नसीब

(written by प्रज्ञा कृष्णराज चौहान)
हे इंसान, 
क्यूं किसी के साथ की तलाश  में, तू जिन्दगी बेकार कर, 
तुझमें बसी है सारी कायनात, कभी तू खुद से तो प्यार कर, 
अगर तू है किसी की चाहत, तो वो आ ही जायेगा तेरे पास, 
बस उस पल  का इंतज़ार कर, खेल तो नसीब का है, 
किसी के नसीब में चाहत बेशुमार है, किसी को एक झलक भी ना गावर है, 
अब देख तेरे नसीब में क्या है, तू बस अपने नसीब का ऐतबार कर...
			

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